पानी का इस्तेमाल नहीं बल्कि पूजते हैं इन गांवों के लोग

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पर्यावरण। “यदि हमने पानी की इज्जत नहीं की तो फिर हमें कोई नहीं बचा सकता है। हम राजस्थानी हर हाल में पानी की बचत करना भी जानते हैं और उसे किफायत से खर्च करना भी”। यह बात राजस्थान के पाली गांव के जार्डन गांव निवासी प्रेम सिंह ने कही।

वह कहते हैं कि हमारे यहां एक कहावत है कि पूरी दुनिया पानी के बिना मर जाएगी, लेकिन राजस्थानी कभी पानी के बिना नहीं मरने वाला, क्योंकि हमने पानी के बिना जीना सीख लिया है।

यह गांव अपनी कई परंपराओं के लिए बहुत ही जाना जाता है। उदाहरण के लिए गांव में पानी के जितने भी स्त्रोत हैं, वहां पर गांव का कोई भी व्यक्ति जूते या चप्पल आदि पहन कर नहीं जाता है। एक तरह से ऐसे स्थानों को गांव में पवित्र स्थान का दर्जा दिया गया है। पानी के स्त्रोत हैं, कुंडी, नाडा, कुंए, तालाब या पानी टंकी आदि।

यह परंपरा गांव में सालों से चली आ रही हैं। इस संबंध में पाली जिले के पर्यावरणीय कार्यकर्ता राजेंद्र सिंह बताते हैं कि इस परंपरा का ही नतीजा है कि अकेले इस गांव में ही नहीं इसके आसपास के लगभग छह गांवों में कभी पानी का संकट देखने को नहीं मिला। क्योंकि ग्रामीण पानी खर्च के मामले में बहुत ही कंजूस होते हैं।

यही नहीं, बारिश के पानी को गांव में हर हाल में सहेज कर रखा जाता है। इसके लिए गांव के तालाबों का ग्रामीण मिलकर हर छह माह में एक बार गाद निकालते हैं। इससे बारिश का पानी पूरे साल भर तक बना रहता है। राजस्थान के पाली, बाड़मेड़ और जेसलमेर जैसे जिलों में इस प्रकार की परंपरा अभी भी जिंदा है।

तालाबों या कुओं के आसपास के जमीन को ग्रामीणों द्वारा पूरी तरह से स्वच्छ रखा जाता है। इसके लिए बकायदा गांव में अप्रत्यक्ष रूप से नियम-कायदे बने हुए हैं कि जल स्त्रोतों के आसपास और उसके ढलान वाले क्षेत्रों में किसी भी प्रकार की गंदगी नहीं फैलाई जाए।

यहां तक कि यदि गांव में कोई बाहरी व्यक्ति आता है तो उसे भी इस बात की हिदायत दी जाती कि वह बाथरूम आदि जाने के पहले जिस घर में आया है, उनसे पूछताछ कर जाए। भंवरी गांव में पानी के प्रति गांववालें इतना अधिक संवेदनशील हैं कि यदि बाहरी आदमी ने गांव के नियम कायदे का कड़ाई से पालन नहीं किया तो उनके साथ मारपीट तक पर उतर आते हैं।

गांव के ताराचंद्र कहते हैं कि हम गांव में पानी को पूजते हैं। यही कारण है कि हमारे गांव में एक नहीं तीन-तीन तालाब हैं और तीनों में सालभर पानी भरा रहता है। हमने यहां भी सभी तालाबों के बीच बंटवारा कर दिया है। जैसे पहले तालाब का पानी केवल पेयजल के लिए दूसरे तालाब में स्नान और कपड़ा आदि धोने के लिए और तीसरे तालाब को हम अपने मवेशियों के लिए छोड़ रखा है।

हालांकि तीनों तालाब की गाद हम सभी गांव वाले साल भर में एक बार अवश्य निकाला करते हैं। इसमें गांव की पंचायत की भी भूमिका भी नगण्य ही रहती हे। चूंकि यह एक सामूहिक कार्य है और इसके लिए गांव के सभी लोग राजीखुशी शामिल होते हैं।

वह कहते हैं कि हमारे गांव की जनसंख्या 4,500 से अधिक है और मवेशियों की संख्या भी 12,000 से अधिक हैं। इसलिए हमने अब हम बारिश के पानी को रोकने के लिए गांव के बाहर से निकलती अरावली की पहाड़ियों के ढालन वाले क्षेत्रों में नाडा बनाने की तैयारी कर रहे हैं।

नाडा यानी एक प्रकार से पहाड़ियों से बारिश का बहने वाला पानी जब नीचे समतल इलाके में पहुंचता है तो वहां पर एक तरफ की मेड़ बांध दी जाती है और इससे होता यह है कि बारिश पानी इस नाडा में एकत्रित हो जाता है और यह मवेशियों को पीने या उनके स्नान के काम आता है। वहीं इससे आसपास के खेतों में नमी भी बनी रहती है इससे खेती के समय लाभ होता है।

वहीं जार्डन गांव के लोग पानी बचाने के लिए और भी तौर-तरीके अपनाते हैं। इनमें एक है कि जब वे अपने गांव में घरों का निर्माण करते हैं तो उसके लिए पर्याप्त मात्रा में घरों की दीवारों व फर्श को बहुतायत मात्रा में पानी की जरूरत पड़ती है।

ऐसे में ग्रामीण जब अपना घर बनाते हैं तो दूसरे गांव वालों को इस बात के लिए प्रार्थना करते हैं कि आप लोग कृपया मेरे निर्माणाधीन घर में अपने घर से पानी लाकर स्नान करें। इससे होता यह है कि उस निर्माणाधीन मकान की दीवारों या फर्श को पक्का करने लिए अपने आप ही पानी मिल जाता है। यह परंपरा अब कुछ ही गांव में बची हुई।

साभार – डाउन टू अर्थ